फॉक डांस को जिंदा रखने 28 साल का जॉय फॉक डांस को देता है मॉर्डन टच 

जिस उम्र में लड़के तमाम ऐशो आराम में अपनी जिंदगी बिताते हैं। ऐसी उम्र में देश के पारंपरिक लोक नृत्यों को जीवंत करने का बीड़ा उठाया है 28 साल के जॉय वाधवानी ने। 19 साल की उम्र में उन्होंने देश की पारंपरिक विरासतों की पहचान की और उन्हें अलग-अलग माध्यमों से समझ कर पहले खुद सीखा। इसके बाद एक ग्रुप बनाकर अपने छात्रों काे परंपरागत तरीके से इसकी शिक्षा देनी शुरू की। 

नतीजा यह रहा कि पिछले 3 सालों में उनके ग्रुप ने कई बड़े मंचों पर अपनी धाक जमाई। इस दौरान जॉय ने बच्चों का सफल मार्गदर्शन करते हुए उन्हें अलग-अलग तरह के लोक नृत्यों में निपुण कर दिया है। जॉय की इसी उपलब्धि पर Agnito Today ने उनसे बातचीत कर पिछले 8 सालों में तय किए उनके सफर के बारे में जाना। 

8 सालों से जारी है लोक नृत्यों को जीवंत बनाए रखने का प्रयास : 
जॉय पिछले 8 सालों से फॉक डांस के अलावा बच्चों को रंगमंच की भी शिक्षा दे रहे हैं। साथ ही एक निजी स्कूल में इंग्लिश ग्रामर की क्लास भी लेते हैं। जॉय बताते हैं कि एक दिन स्कूल के एक कार्यक्रम का आयोजन था। इस मौके पर स्कूल एडमिनिस्ट्रेशन ने उन्हें स्टूडेंट के साथ मिलकर एक ग्रुप डांस तैयार करने के लिए कहा। बस यहीं से उनके मन में बच्चाें को डांस सिखाने का विचार आया।


बाद में उन्होंने देखा की देश में लगातार वेस्टर्न कल्चर हावी हो रहा है। ऐसे में बच्चे अपने पारंपरिक नृत्यों को भी भुला बैठे हैं। यहीं से उनकी जिंदगी में एक मकसद मिला और उन्होंने बच्चाें को लोक नृत्यों को मॉर्डन टच के साथ सिखाना शुरू किया। 

छोटे मंच धीरे-धीरे बड़े होते गए : 
जॉय बताते हैं कि डांस का शौकीन उन्हें बचपन से रहा है, लेकिन छोटी उम्र में ही उनके सिर पर बड़ी जिम्मेदारियों आ गई थीं। इस कारण डांस कहीं पीछे छूट गया, लेकिन स्कूल में एक बार जिम्मेदारी मिलने के बाद इस काम को ही उन्हाेंने एक मिशन बना लिया। इससे एक के बाद एक कड़ियां जुड़ती गईं। पहले उन्हें कुछ छोटे मंचों पर अपने हुनर को दिखाने का मौका मिला, लेकिन धीरे-धीरे मंच बड़े होते गए। 


जाॅय बताते हैं कि राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम बालरंग में उनके ग्रुप ने भोपाल संभाग स्तर पर मप्र का बधाई लोकनृत्य प्रस्तुत कर पहला स्थान हासिल किया। यही उनके ग्रुप की पहली बड़ी उपलब्धि रही। 

देशभर में प्रचलित 17 लोकनृत्यों का करवाया मंचन : 
जॉय ने कोली, देवी गोंधल, मप्र का बधाई, कठपुतली लोकनृत्य, मोहिनीअट‌्टम, कथकली, मोरनृत्य, कालबेलिया, चिराव, नोटंकी नृत्य और मालवा में किए जाने वाले फॉक डांस भी बच्चों को सिखाए हैं। जॉय बताते हैं कि इन लोक नृत्यों को सीखने के लिए वे बारीकी से इनका अध्ययन करते हैं। इसके लिए सोशल मीडिया पर जुड़े देशभर के कलाकारों से सलाह मशविरा लेते रहते हैं। 


साथ ही दूरदर्शन के स्थानीय चैनलों और यू ट्यूब पर भी अलग अलग फॉक डांस की जानकारी लेते रहते हैं।  इन नृत्यों को सीखने के लिए वे महाराष्ट्र, उप्र और मप्र के मालवा क्षेत्र की भी यात्राएं कर चुके हैं। 

जिन बच्चों जानकारी नहीं उन्हें मंच देने का प्रयास : 
जॉय बताते हैं कि उन्हें बचपन में कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ा। इसलिए आर्थिक रूप से कमजारे बच्चों की प्रतिभा कहीं दब न जाए, इस कारण बच्चाें को नि:शुल्क नृत्य, रंगमंच, चित्रकला और गायन सिखा रहे हैं। जॉय के अनुसार वे नहीं चाहते हैं ऐसी समस्याओं से बच्चे जूझें।


जॉय की इस लगन को देखकर उनके पिता अनिल वाधवानी भी उनके साथ इस काम में जुट गए हैं। जॉय बताते हैं कि उनके पिता भी कुछ समय तक रंगकर्म के क्षेत्र में जुड़े हुए थे। वहीं उनकी मां रितु वाधवानी भी जॉय के इस काम की प्रशंसा करती हैं। वहीं अंकित, दीपक, पल्लवी, दीपा, आफरीन, काजल और रूपाली भी उनके साथ लोकनृत्यों की परंपरा को बनाए रखने के लिए कार्य कर रही हैं।