40 सालों से लोगों को सिंधियत के रंग में रंग रहा काका का दाल पकवान

मैदे की गोल-गोल आटे की आकार की पपड़ी, उस पर गर्मागर्म चने की दाल डाल इमली की चटनी, हरे धनिया और पुदीने की चटनी । साथ में लाल मिर्च, काला नमक, जीरावन का जायका। इतना ही नहीं इस पर भी प्याज और हरी मिर्च की स्टफिंग। यह सुनते ही किसी के भी मुंह में पानी आ जाएगा, लेकिन यदि इसे चखना चाहते हैं तो इसके लिए आपको भोपाल के जुमेराती का रुख करना होगा।

(जुमेराती का काका दाल पकवान जहां सुबह से ही लोगों की भीड़ दाल पकवान का स्वाद चखने के लिए जुटने लगती है)
भोपाल का जुमेराती क्षेत्र, दोपहर का लगभग 1 बजे का समय यहां स्थित आशापुरा दरबार के पास लगने वाले काका के दाल पकवान के ठेले के आसपास लगभग 35 से 40 लोगों की भीड़। इस दौरान सब लोगों की अलग-अलग मांगों को 28 साल के पंकज मोटवानी मशीन से भी तेज गति से पूरा करते हैं। पंकज बताते हैं कि सुबह 11 बजे से यहां ठेला लगने के बाद यह भीड़ लगभग 4 बजे तक इसी तरह बनी रहती है। इस दौरान वे रोजाना 300 से 350 लोगों को दाल पकवान खिला देते हैं। पंकज बताते हैं कि दाल पकवान का ठेला भोपाल में सबसे पहले उनके पिता जी ने ही लगाया था। उसके बाद हाल ही के कुछ सालों में अन्य लोगों ने भी दाल पकवान का ठेला लगाना शुरू किया है।

(काका दाल पकवान शुरू करने वाले गोपीचंद मोटवानी का समय अब घर पर परिवार के साथ बीतता है।)
40 साल पहले काका गोपीचंद ने की थी शुरुआत :
40 साल पहले भोपाल के शाहजहांनाबाद में रहने वाले गोपीचंद मोटवानी ने दाल पकवान की शुरुआत की थी। लोग प्यार से उन्हें काका बुलाते थे। उस दौर में वे छोटा दाल पकवान आठाने का और बड़ा दाल पकवान 1 रुपये का बेचते थे, जो दस साल बाद 1 रुपए और दो रुपए का हो गया था। काका शाहजहांनाबाद से लोगों को दाल पकवान खिलाते हुए आते थे और जुमेराती स्थित आशापुरा दरबार के पास आकर रुक जाते थे। यहां दोपहर 1 बजे तक लोग उनके दाल-पकवान का स्वाद चखने आते थे। उसके बाद यही क्रम अगले दिन चलता था।

(पंकज, मनोज और हरीश पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, वहीं दो भाई अनिल और सोनू दूसरा काम करते हैं)
लोगों की सेवा करना मोटवानी परिवार का लक्ष्य :
पंकज के दो बड़े भाई मनोज और हरीश भी इसी काम में तन और मन से जुटे हैं। हालांकि लगभग 6 वर्ष पूर्व उन्होंने जुमेराती स्थित पुरानी पोस्ट ऑफिस क्षेत्र में भी काका दाल पकवान नाम से दुकान शुरू की है। दोनों भाई यहां दाल पकवान के साथ वेज बिरयानी, पुड़ी सब्जी, और इडली सांभर का भी स्टॉल लगाते हैं। हरीश बताते हैं कि उनका लक्ष्य केवल दाल पकवान बेचना नहीं है। कम दाम में किसी गरीब का पेट भर जाए, इस ध्येय को लेकर वे रोजाना घर से निकलते हैं।

(पंकज अपने पिता के साथी रहे सुरेश नेमा जी के साथ सुरेश काका के दाल पकवान के साथ पिछले 40 सालों से जुड़े हुए हैं।)
सिंधिंयों के नाश्ते से दुनिया को कराई पहचान :
मनोज बताते हैं कि उनके पिता ने लगभग 4 दशक पहले सिंधियों के नाश्ते से दुनिया को परिचित करवाया। सिंध में लोग नाश्ते में दाल-पकवान खाते थे, जिसे काका ने भोपाल में बनाना शुरू किया। वहीं पंकज बताते हैं कि उनकी दादी गोविंदी बाई सुबह सुबह उठकर दाल बनाती थीं, जिसे पापा लेकर निकलते थे। जब हम छोटे थे तो पापा के साथ ही कई बार शाहजहांनाबाद से जुमेराती आ जाते थे।

मैदे की पपड़ी और चने की दाल से बनता है यह व्यंजन :
दाल पकवान बनाने के लिए एक दिन पहले रात को मैदे की रोटी जैसी पपड़ी बनाकर उसे तलकर तैयार कर लिया जाता है। अगले दिन सुबह 5 बजे दाल बनाने के लिए उसे सुबह सुबह गलाया जाता है। 2 घंटे बाद दाल में नमक, हल्दी डालकर उसे उबाला जाता है। इसके बाद पकवान के ऊपर दाल डालकर उसमें स्वाद अनुसार लाल मिर्च, नमक, इमली की चटनी और हरी चटनी डालकर बनाया जाता है। साथ ही इसे बारीक कटी हुई प्याज, तली हुई मिर्च के साथ ग्राहकों को खिलाया जाता है।
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