सिग्नल तोड़ भोपाल स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर 1 पर आ गई थी शताब्दी

भारतीय रेलवे में लोको पायलट द्वारा रेड सिग्नल तोड़ना सबसे गंभीर गलतियों में गिना जाता है। रेलवे में लोको पायलट द्वारा SPAD (सिग्नल पासिंग एट डेंजर) के नियमों का उल्लंघन करने, रेड सिग्नल तोड़ने या रेड सिग्नल को पार कर ट्रेन को आगे ले जाए जाने पर नौकरी से निकालने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति तक की सजा का प्रावधान है। ऐसे में प्राप्त जानकारी के अनुसार 3 फरवरी को शताब्दी के लोको पायलट संजय खरे ने रेड सिग्नल तोड़कर गाड़ी स्टेशन तक पहुंचा दी।

इस दौरान ट्रेन भोपाल स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 तक पहुंच गई। इस वक्त प्लेटफॉर्म पर गोरखपुर-एलटीटी एक्सप्रेस निकली ही थी। यदि प्लेटफॉर्म पर खड़ी गाड़ी को निकलने में किसी तरह की देरी हो जाती, तो किसी बड़ी घटना के होने से इंकार नहीं किया जा सकता है। 

2 मिनट के अंतराल से टल गया बड़ा हादसा : 
नई दिल्ली-भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस को देश की सबसे प्रीमियम ट्रेनों में से एक माना जाता है। जानकारी के अनुसार प्लेटफॉर्म नंबर-1 पर गोरखपुर-एलटीटी एक्सप्रेस खड़ी होने के कारण शताब्दी एक्सप्रेस को भोपाल स्टेशन से 500 मीटर दूर होम सिग्नल (प्लेटफॉर्म से पहले वाला सिग्नल) रेड दिया गया था। इस दौरान लोको पायलट को गाड़ी रोक देनी चाहिए थी।


लेकिन गाड़ी सिग्नल तोड़ते हुए प्लेटफॉर्म नंबर-1 तक आ गई। इस दौरान गाड़ी की स्पीड 18 किमी प्रतिघंटा थी और शताब्दी के पहुंचने के ठीक 2 मिनट पहले ही गोरखपुर-एलटीटी एक्सप्रेस इसी प्लेटफॉर्म से रवाना हुई थी।  

कई स्तर पर हुई लापरवाही : 
इस मामले में लोको पायलट के अलावा रेलवे के सिग्नलिंग और गाड़ी के ऑपरेटिंग स्टाफ की लापरवाही भी सामने आ रही है। मामले में अब तक डीआरएम भोपाल ने लोको पायलट संजय खरे को निलंबित कर दिया है और मामले की विभागीय जांच के आदेश भी दे दिए गए हैं। हालांकि इस मामले में लापरवाही रेलवे के अन्य स्टाफ ने भी की है, जिसकी जानकारी विस्तृत जांच के बाद ही आएगी। 

इस मामले में सबसे पहले शताब्दी को होम सिग्नल से पहले ही रोक दिया जाना था। इसकी जिम्मेदारी सिग्नलिंग स्टॉफ की थी। इसके बाद यदि गाड़ी होम सिग्नल पर आ गई तो इसे वहीं सिग्नल के ग्रीन होने का इंतजार करना था। लेकिन यहां गाड़ी ने सिग्नल को नहीं माना और सीधे स्टेशन तक आ गई। इसकी जिम्मेदारी लोको पायलट की है। 

वहीं जब गाड़ी सिग्नल तोड़कर आगे बढ़ रही थी तो ट्रेन में मौजूद अन्य स्टाफ को तत्काल ही लोको पायलट काे सूचित कर सिग्नल का पालन करवाना था। 

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ऐसे मिलती है शताब्दी की कमान : 
शताब्दी और राजधानी जैसी प्रीमियम ट्रेन के लोको पायलट के पद पर पहुंचना आसान काम नहीं होता। रेलवे में लोको पायलट बनने के लिए के लिए सबसे पहले अभ्‍यार्थी को असिस्टेंट लोको पायलट के पद से गुजरना होता है। असिस्टेंट लोको पायलट के पद पर काम किए जाने के दौरान अभ्‍यार्थी को मालगाड़ी तथा कुछ सालों के अनुभव के बाद पैसेंजर ट्रेनों के संचालन का कार्यभार संभालना होता है।


इस पद पर कम से कम 10
 साल के अनुभव के बाद असिस्‍टेंट लोको पायलट से लोको पायलट का सफर तय होता है। इतने एक्सपीरियंस के बाद एक्सप्रेस अथवा मेल ट्रेन के संचालन का कार्य दिया जाता है। इस दौरान अत्यधिक अनुभवी लोको पायलट को ही शताब्‍दी, दुरंतो तथा राजधानी जैसी सुपर मेल या प्रीमियम ट्रेनों के संचालन का कार्य दिया जाता है।

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इस सजा का है प्रावधान :  
लोको पायलट द्वारा रेड सिग्नल को तोड़ कर ट्रेन को आगे बढ़ादेने पर नौकरी से निकालने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति की न्यूनतम सजा का प्रावधान था। जिसे 4 वर्ष पूर्व रेलवे बोर्ड ने SPAD को संशोधित कर कुछ लचीला बना दिया था। 
 
संशोधित नियम के अनुसार ऐसे मामलों मे नौकरी से निकालने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति की सजा तभी दी जाए जब जांच कर रही कमेटी को यह स्पष्ट हो जाए कि रेड सिग्नल लोको पायलट की लापरवाही से ब्रेक किया गया है। इस दौरान लोको पायलट को वर्ष 1999 से लागू नियमों में संशोधन कर रेलवे बोर्ड ने लोको पॉयलटों को राहत दी थी। 
 
संशोधित नियम के अनुसार जांच कमेटी या अपील अधिकारी उस लोको पायलट को सिग्नल ओवर शूट में दोषी नहीं मानते हैं, तो उसका पुन: मनोवैज्ञानिक परीक्षण कर उसकी नए सिरे से ट्रेनिंग करवा कर उसे फिर से लोको पायलट बनाएंगे, लेकिन यदि वह इस परीक्षण में फेल हो जाता है, तो उसे रेलवे के ही किसी दूसरे विभाग में पोस्टिंग दी जाएगी।

जहां लापरवाही मिलेगी कार्रवाई होगी : 
इस घटना की जांच चल रही है। संपूर्ण तथ्य हमारे सामने नहीं है। जिस भी स्तर पर गलती मिलेगी। रेलवे की ओर से कार्रवाई की जाएगी।

- प्रियंका दीक्षित, मुख्य प्रवक्ता
  पमरे, जबलपुर जोन

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