लोक कलाओं को जीवंत करने वाले कपिल तिवारी और भूरी बाई को पद्मश्री सम्मान

साहित्य और शिक्षा में अपना संपूर्ण जीवन न्यौछावर कर देने वाले वरिष्ठ साहित्यकार कपिल तिवारी और भीली चित्रकार भूरी बाई को जैसे ही पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया, राजधानी भोपाल के कला-साहित्य के क्षेत्र से जुड़े लोगाें में खुशी की लहर दौड़ गई। कपिल तिवारी को अविभाजित मप्र के आदिवासी क्षेत्रों से होनहार कलाकारों को ढूढने और भूरी बाई को आदिवासी भील पिथौरा पेंटिंग से पूरी दुनिया को रूबरू करवाने के लिए जाना जाता है। 

जहां कपिल तिवारी ने लोक संस्कृति साहित्य से जुड़ी 39 पुस्तकों का संपादन किया है। वहीं भूरी बाई पिथौरा पेंटिंग को लेकर अमेरिका तक गईं। विदेश में जाकर उन्होंने सदियों पुरानी इस कला को एक अंतर्राष्ट्रीय मंच प्रदान किया। पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद Agnito Today ने दोनों ही कलाकारों से बातचीत कर उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलुओं के बारे में जाना। 

भूरी बाई बताती हैं कि वे मां के कहने पर वो होली, दीपावली या किसी की शादी पर चित्रकारी करती थीं और अपने घर की दीवारों को सजा देती थीं। बाद में शादी हुई और पति के साथ मजदूरी करने भोपाल आ गईं। जब वे भोपाल आईं तब भारत भवन का निर्माण कार्य चल रहा था। भूरी बाई वहीं मजदूरी करने जाया करती थीं। उसी समय उनकी मुलाकात जगदीश स्वामीनाथन से हुई। तब वे हिंदी नहीं समझती थीं। 

स्वामीनाथन ने उजागर किया मजदूर में छिपा कलाकार : भूरी बाई 
भूरी बाई बताती हैं कि एक दिन स्वामीनाथन जी ने भारत भवन में काम करने वाली सभी लेबर से पेंटिंग बनाकर दिखाने की बात कही। हालांकि सब लोगों ने पेंटिंग करने से मना कर दिया। तब भूरी बाई की बहन और जीजा ने उन्हें पिथौरा पेंटिंग बनाने के लिए कहा। जब स्वामीनाथन को यह बात पता चली तो वे पेंटिंग बनाने के लिए जोर देने लगे। उनके द्वारा बार-बार कहने पर भूरी बाई ने कहा कि मैं यहां मजदूरी करने आई हूं और मेरे पति पूछेंगे कि तुमने आज काम नहीं किया। तो उनको क्या जवाब दूंगी।

उस दौर में भूरी बाई को 6 रुपए मेहनताना मिलता था, लेकिन स्वामीनाथन ने उन्हें पेंटिंग बनाने पर रोजाना 10 रुपए मेहनताना देने का वादा किया। बस यही जीवन का टर्निंग प्वाइंट रहा। भूरी बाई कहती हैं पेंटिंग करना भले किसी ने न सिखाया हो, लेकिन उसे दुनिया के सामने जगदीश स्वामीनाथन लेकर आए। 

6 रुपए रोज कमाने वाली को जब 15 सौ मिले : 
उस दौर में दिन भर पत्थर तोड़ने पर 6 रुपए मिलते थे, लेकिन मुझे बैठे-बैठे ही 5 दिन के 50 रुपए मिल गए। डेढ़ साल बाद फिर स्वामीनाथन से मुलाकात हुई और इस बार उन्होंने 10 दिन चित्र बनवाए और मुझे 15 सौ रुपए दिए। उस दौर में 15 सौ बहुत बड़ी बात हुआ करती थी। भारत भवन तब बन ही रहा था।

इसके बाद फिर 2.5 साल बाद मेरी उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने बताया कि मुझे शिखर सम्मान के लिए चुना गया है। मैं पढ़ी लिखी तो थी नहीं, लेकिन कुछ लोगों ने बताया कि मुझे शिखर सम्मान मिलने वाला है। भूरी बाई कहती हैं कि आज जो कुछ भी हूं, स्वामीनाथन जी की बदौलत हूं। इसके बाद उन्हें रानी दुर्गावती सम्मान भी मिला। फिर मप्र गौरव सम्मान भी मिला। 
 
हम अपनी परंपरा को छोड़ कर शिक्षित नहीं हो सकते : कपिल तिवारी 
आधुनिक शिक्षा में आज हम अपनी परंपरा को जाने बिना शिक्षित हो रहे हैं। इसलिए परफार्मिंग आर्ट से मैंने अपने कैरियर की शुरुआत की।धीरे-धीरे मैंने सीखना शुरू किया और जनजातीयों से जुड़ी शिल्पकारी पर काम करना शुरू किया। इस दौरान मैंने पाया की इन जनजातियों से जुड़े जो शिल्प हैं। हम जिन्हें जनजातीय शिल्प कहते हैं, उसमें से 80 प्रतिशत उनकी आस्था का केंद्र हैं।

इसके बाद मैंने इन केंद्रों पर काम करना शुरू किया और धीरे-धीरे चीजें मुझे समझ में आना शुरू हुईं। इस दौरान करीब 3 दशक बीत गए। मैंने पाया कि कला भारत में जीवन से कभी अलग नहीं रही। हमारे साथ कला एक यात्रा करते हुए चली आई। यह यात्रा जिन लोगों के कारण संभव हुई वे भारत के सबसे गरीब लोग हैं और अशिक्षित लोग हैं। साथ ही ये लोग सबसे उपेक्षित और उपहास का पात्र भी थे। 

मैं अब खुश हूं कि हमने ऐसे लोगों को समझना शुरू कर दिया है और इनकी कला को दुनिया के सामने ला रहे हैं। सही अर्थों में अब हम अपनी संस्कृति और परंपरा काे समग्रता के साथ समझना शुरू कर दिया है। 

गांव ही होंगे हमारे असल संग्रहालय : 
यदि हम गांव के स्तर पर कला को सुरक्षित रखने का उपाय करेंगे तो कला सुरक्षित रहेगी। इसे शहर में लाकर इसका संग्रहालय बनाना मुझे ठीक नहीं लगता है। ऐसी जगहों को बचाना ही जीवंत संग्रहालय बनाना है। हम ऐसी जगहों पर संग्रहालय बनाते हैं जो लोक कलाओं को समझते ही नहीं हैं। जबकि हमें ऐसे गांवों को सुरक्षित करना होगा। जहां के लोगों के मन में ऐसी कलाएं घर किए हुए हैं। 

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