शहर का शोर छोड़ गांव के सुकून में लौटे प्रतीक, जैविक खेती कर तैयार किया खुद का बिजनेस मॉडल

आज जहां एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों से हजारों की संख्या में युवा रोजी-रोटी की चाह में शहरों का रुख कर रहे हैं। वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो कॉरपोरेट की चमक-धमक को पीछे छोड़ गांवों का रुख कर रहे हैं। ये लोग अपने लिए खेतों से अजीविका जुटा रहे हैं। साथ ही अपने आसपास के सैकड़ों किसानों को भी खेती को मुनाफे का व्यवसाय बनाने के लिए तैयार कर रहे हैं।

ऐसे ही एक शख्स भोपाल के गुलमोहर में रहने वाले प्रतीक शर्मा हैं। जिन्होंने बैंकिंग की अच्छी खासी नौकरी को छोड़ खेती को अपनाया। Agnito Today से बात करते हुए प्रतीक ने बताया कि शुरुआत में कई समस्याओं का सामना किया, लेकिन हार नहीं मानी, बल्कि कम लागत में अच्छी फसल कैसे मिले? इसके लिए लगातार अध्ययन करता रहा। इसलिए 2016 में ग्रीन एंड ग्रेन्स की स्थापना की।

मन में बसा था गांव, नौकरी छोड़ बने किसान :
प्रतीक बताते हैं कि बचपन होशंगाबाद के ढाबाखुर्द गांव के खेतों में बीता। छोटी उम्र में ही खेती के कई गुर सीख लिए थे, लेकिन आठवीं के बाद अच्छी स्कूलिंग के लिए परिवार के साथ भोपाल आ गए। पढ़ाई के बाद कॉरपोरेट में एक अच्छी जॉब भी मिल गई, लेकिन मन में हमेशा गांव ही बसा था। इसलिए 2012 में गांव का रुख किया।

हालांकि इस दौरान नौकरी भी चलती रही, क्योंकि परिवार और बच्चों की भी फिक्र थी। साथ ही कॉरपोरेट की नौकरी करते हुए भी एक लंबा समय बीत चुका था, लेकिन अगले तीन सालों में चीजें उम्मीद के मुताबिक ढलती दिखीं, तो 2016 में नौकरी छोड़ पूरी तरह से खेती करने लगे। 

बेहतर मैनेजमेंट से सुलझाईं दो बड़ी समस्याएं :
शुरुआत में कई चुनौतियां सामने आईं, लेकिन जैसा सोचकर आए थे। परेशानियां उससे बिल्कुल अलग थीं। लागत ज्यादा थी और फसलों का मूल्य उम्मीद के मुताबिक बिल्कुल नहीं था। कई बार तो लागत भी नहीं निकल रही थी। इसलिए लागत कम करने के लिए प्रतीक ने जैविक खेती का रुख किया।

इस दौरान कैमिकल का उपयोग पूरी तरह बंद कर दिया गया। बीज, कीटनाशक और खाद भी खेत पर तैयार किए गए। अपनी फसलों को मंडी या किसी कॉरपोरेट घराने को देने की बजाय सीधे कस्टमर्स तक पहुंचाया। इससे फसल की लागत में भी कमी आई और सीधे कस्टमर्स तक फसल पहुंचाने में ज्यादा मुनाफा होने लगा। इससे धीरे-धीरे उनका मॉडल मजबूत होता गया। 

जमीन में उर्वरता बनी रहे इसके लिए उन्होंने पुरानी फसलों के कचरे को ही खाद बनाना शुरू किया। इससे राइजोबियम और ऐसे ही अन्य बैक्टीरिया जमीन में बढ़ने लगे। जिससे जमीन की उर्वरता बढ़ी। इससे लागत कम हुई, फसलों से कैमिकल पूरी तरह खत्म होने लगे और कचरे का भी प्रबंधन होने लगा। 

जरूरत है खेतों में समय बिताने की :
प्रतीक बताते हैं कि उनकी शुरुआत भी रासायनिक खेती से हुई। लेकिन रसायनों की लागत से उन्हें समझ आने लगा कि लागत कम करने इसे छोड़ना होगा। साथ ही अपनी बेटी का चेहरा देख एक सवाल उनके मन में गूंजा, क्या अपनी बेटी को भी वे रसायन वाली सब्जियां खिलाएंगे?

इसके बाद एक एनजीओ से जैविक खेती की ट्रैनिंग ली और इस पर प्रयोग करना शुरू किया। प्रतीक के अनुसार खेती को समझने के लिए जो आज के समय में सबसे बड़ी जरूरत है, वह खेतों में समय बिताने की है। यदि आप लंबे समय तक खेतों में समय बिताते हैं, तो आप खेतों और प्रकृति को समझने लगते हैं। यही कारण रहा कि अगले डेढ़ साल में उन्होंने जैविक खेती से उत्पादन लेना शुरू कर दिया। 

खेती को डिजिटल करने की जरूरत :
प्रतीक बताते हैं कि उनके बिजनेस के दाे मुख्य फैक्टर हैं। पहला फार्मिंग और दूसरा डिस्ट्रीब्यूशन। प्रतीक के अनुसार किसानों को यदि खेती से मुनाफा कमाना है, तो इन दोनों ही फैक्टर्स को डिजिटल करने की जरूरत है। इसलिए वे अपने आसपास के किसानों को तकनीक के सहारे खुद के साथ जोड़ रहे हैं। 


वहीं लोगों तक समय पर सब्जियां पहुंचे। इसके लिए फिलहाल उन्होंने व्हाट्स एप का सहारा लिया है। इसके जरिए कस्टमर्स उन्हें ऑर्डर देते हैं और वे समय पर उन तक सब्जियां पहुंचाते हैं। इसके लिए जल्दी ही वो एक एप लांच करने की भी तैयारी कर रहे हैं।

प्रतीक के मॉडल की बेकबॉन हैं प्रतीक्षा : 
प्रतीक की पत्नी प्रतीक्षा भी इस पूरे घटनाक्रम में उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं। प्रतीक बताते हैं कि यदि उनके इस पूरे मॉडल की कोई बेकबॉन है, तो निश्चित ही वो प्रतीक्षा हैं। प्रतीक्षा ने खेतों के बाद डिस्ट्रीब्यूशन का पूरा मॉडल सफल तरीके से संभाला हुआ है। उन्हीं की बदौलत कस्टमर्स तक सही समय में सब्जियां पहुंचना सुनिश्चित हुआ है। 

आईटी इंजीनियर प्रतीक्षा बताती हैं कि 2012 में चंडीगढ़ में एक दिन प्रतीक ने अपने मन की इच्छा जाहिर की। शुरुआत में तो मैंने इसे पूरी तरह से नकार दिया। क्योंकि हम लोग अच्छे तरीके से सेटल हो चुके थे। लेकिन अगले तीन सालों तक ये सब चलता रहा। इस दौरान मैंने भी समझा कि हम अपनी बेटी को कैमिकल फ्री फूड उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं, तो यही टर्निंग प्वांइट रहा और मैं भी इसी दिशा में प्रतीक के साथ कदमताल करने लगी। 

प्रतीक्षा बताती हैं कि शुरुआत में प्रतीक अकेले ही काम करते थे, लेकिन 2017 में मैं भी उनके साथ पूरी तरह से जुड़ गई। किसान से क्या और कितनी मात्रा में लेना है। वो सारा काम मेरा है।


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