टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मप्र में 3 सालों में मरे सबसे ज्यादा बाघ, आरक्षित क्षेत्र कम होने का नुकसान

टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मप्र में पिछले 3 वर्षों में 88 बाघों की मौत हुई है। यह जानकारी केंद्रीय वन मंत्रालय की इसी महीने की रिपोर्ट के आधार पर मिली है। इस रिपोर्ट के अनुसार मप्र में 40 युवा बाघों या शावकों की मौत टेरिटोरियल फाइट (क्षेत्र के लिए होने वाली लड़ाइयां) में हुई। जबकि 14 बाघों का शिकार किया गया। वहीं 6 बाघाें के अंग भी बरामद किए गए। 

वन्य प्राणी विशेषज्ञ बताते हैं कि 50 से 60 वर्ग किमी क्षेत्र में अपनी टेरिटरी बनाता है। इसमें एक बाघ के साथ लगभग 2 बाघिन भी रहती हैं। वर्तमान में मप्र में 526 बाघ हैं। वहीं वन क्षेत्र 77483 वर्ग किमी है, लेकिन खास बात यह है कि 10174 वर्ग किमी ही टाइगर टेरिटरी के लिए आरक्षित है। 

लगातार बढ़ रहे हैं बाघ, लेकिन टेरिटरी सीमित : 
जानकारी के अनुसार मप्र में सबसे ज्यादा टाइगर टेरिटोरियल फाइट कान्हा और बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हुई। इस दौरान लगभग 25 बाघों की जान गई। वहीं वन्य क्षेत्र की बात करें तो कान्हा के 2051.791 वर्ग किमी में 108 बाघों का बसेरा है। वहीं बांधवगढ़ के 1537 वर्ग किमी में 124 बाघ रहते हैं। 


जबकि दोनों ही नेशनल पार्क में बाघों की संख्या के आधार पर 5 से 7 हजार वर्ग किमी का वन्य क्षेत्र होना चाहिए। प्रदेश में 526 बाघों के लिए लगभग 32 हजार वर्ग किमी क्षेत्र आरक्षित होना चाहिए, जबकि बाघों के लिए इसका 10 प्रतिशत ही आरक्षित है। हालांकि वन्य क्षेत्र के मामले में मप्र देश का अग्रणी राज्य है। ऐसे में प्रदेश में अन्य टाइगर टैरिटरी बनाने की आवश्यकता है, ताकि बाघों को पनपने का भरपूर मौका मिल सके।

यह भी पढ़ें : भोपाल के पास शुरू हुई टाइगर सफारी, जहां जटाओं के रूप में मौजूद है कैरी महादेव

मप्र में अलग अलग वन्य क्षेत्र में बाघों की स्थिति : 

वन्य क्षेत्र           बाघों की संख्या 
बांधवगढ़        : 124
कान्हा           : 108
पैंच              : 87
सतपुड़ा         : 47
पन्ना             : 36
रातापानी        : 45
भोपाल          : 18
संजय डुबरी    : 06
अन्य            : 55

सैकड़ों किमी तक घूमते हैं बाघ : 
दरअसल वृद्ध बाघ कई बार युवा बाघों से हारने के बाद सैकड़ों किमी तक घूमने निकल जाते हैं। मेटिंग के काल में भी बाघ अक्सर अपनी टेरिटरी छोड़ बाघिन से मिलन को लेकर लंबी यात्राएं करते हैं। इसी दौरान बाघों का अक्सर दूसरे बाघों से संघर्ष होता है। वहीं कई बार युवा बाघ नन्हे शावकों को मार देते हैं, ताकि बाघिन से मेटिंग कर सकें। बाघ टेरिटोरियल फाइट में सबसे ज्यादा संघर्ष इन्हीं कारणों से होता है। 


प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघों के बसेरे बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर विन सेंटर रहीम बताते हैं कि यहां मौजूद 124 बाघों में से 20 ऐसे हैं जो अक्सर उमरिया और शहडोल तक के जंगलों में चले जाते हैं। इस दौरान आसपास के गांवों में भी विचरण करते हैं और कई बार मानव के सामने आ जाने पर उन पर हमला भी कर देते हैं। 

वहीं जानकार बताते हैं कि मप्र में बाघों के आपसी संघर्ष रोकने के लिए जरूरी है कि प्रदेश में अन्य टाइगर रिजर्व भी बनाए जाने चाहिए, ताकि बाघ सुरक्षित रह सकें। 

यह भी पढ़ें : स्मृति वन पर वन मंडल का पहरा, एक्सपर्ट की राय गेट बंद न करें लगाएं अर्जुन के पेड़

पिछले तीन सालों में प्रदेश में हुई बाघों की मौत का कारण : 

प्राकृतिक मौत : 37
दुर्घटना        : 0
जांच के दायरे : 31
अवैध शिकार : 14
जब्त अंग     : 06

 Latest Stories